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भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों का वैश्विक योगदान

अर्पित कुमार

शोधच्छात्र संस्कृत तथा प्राकृत भाषा विभाग , लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

Abhinavdhara: International Journal of Innovation in Indic Studies

Volume-4

Issue: 1

Publication year-2026

शोधसारः वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिक असंतुलन और संसाधनों का अनियंत्रित दोहन मानवता के अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन गए हैं। यद्यपि संयुक्त राष्ट्र के 'सतत विकास लक्ष्य' इन समस्याओं के समाधान हेतु एक ढांचा प्रदान करते हैं, किंतु उनकी सफलता के लिए एक सुदृढ़ नैतिक और दार्शनिक आधार की आवश्यकता है। प्रस्तुत शोध पत्र 'भारतीय ज्ञान परंपरा' के दार्शनिक स्तंभों और सतत विकास के बीच के अंतर्संबंधों का अन्वेषण करता है। यह शोध ईशावास्योपनिषद के 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा', अथर्ववेद के 'पृथ्वी सूक्त' और भगवदगीता के 'अपरिग्रह' जैसे सिद्धांतों के माध्यम से यह सिद्ध करता है कि भारतीय चिंतन में विकास की अवधारणा 'प्रकृति के विरुद्ध' नहीं, बल्कि 'प्रकृति के साथ' सह-अस्तित्व पर आधारित है। शोध पत्र में प्राचीन जल प्रबंधन, प्राकृतिक कृषि और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की वैश्विक प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है।
अंततः, यह शोध यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्य आधुनिक विज्ञान के पूरक बनकर एक संतुलित, न्यायपूर्ण और स्थायी वैश्विक भविष्य की नींव रख सकते हैं।

Kerwords- भारतीय ज्ञान परंपरा, सतत विकास, श्रीमद्भगवदगीता, ईशावास्योपनिषद, पारिस्थितिक नैतिकता, अपरिग्रह, वसुधैव कुटुंबकम्, पंचमहाभूत, जलवायु परिवर्तन।

Page Number-8-20

10.67754/ijiis.vol4.issue.01.002

How to cite ?- Kumar, A. (2026). Bhāratīya Jñāna Paramparā ke Mūlyon kā Vaiśvika Yogadāna. Abhinavdhara : International Journal of Innovation in Indic Studies, 4(1), 8-20. https://doi.org/10.67754/ijiis.vol4.issue.01.002

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