top of page

 

Special Edition- 2

VOL-2

​

 Abhinavdhara – IJIIS​

Explore the Special Edition-2 of Abhinavdhara (IJIIS) featuring peer-reviewed research articles on Indic Studies, Sanskrit, Indian Philosophy, and Culture.

 

SRIJANSHODH 2026

International conference on Indian Knowledge Systems, Art, Design, Wellness, and Cultural Heritage                 

 

Organised by ​

 Shabdārambh:

Global Academy of Art,Culture, Languages & Wellness Date: 29th & 30th August 2026 (virtual mode) 

ओडिशा की पट्ट चित्रकला : अतीत एवं वर्तमान

कौशिकी चौहान,
शोध छात्रा, चित्रकला विभाग, दृश्य कला संकाय,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय,वाराणसी

सारांश
भारतीय समाज अपनी प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं, अद्वितीय विविधता, सहिष्णुता एवं समावेशिता के लिए विश्व विख्यात है। यह न केवल धर्म अपितु भाषा, कला, संगीत, साहित्य, रंगमंच, नृत्य, खान-पान, व्रत, त्यौहार, वस्त्र-परिधान, संस्कार, अनुष्ठान, रीति-रिवाज, जीवन शैली जैसे प्रत्येक पहलुओं को समाहित किए हुए हैं। ओडिशा के पट्ट चित्रकला भारतीय चित्रकला परंपरा की एक बहुमूल्य विरासत है, जो धार्मिक आस्थाओं, सांस्कृतिक पहचान, तथा उत्कृष्ट कलात्मक कौशल का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती है। पट्ट चित्रकला की उत्पत्ति लगभग 12वीं शताब्दी से मानी जाती है, जिसका गहरा संबंध ओडिशा की सचित्र पांडुलिपि, वैष्णव एवं जगन्नाथ संप्रदाय से रहा है। प्रारंभिक काल में जहाँ पट्टचित्रों के विषय बौद्ध, तांत्रिक एवं पौराणिक कथाओं पर आधारित थे, वहीं समय के साथ यह कला मुख्यतः जगन्नाथ परंपरा, रथयात्रा एवं मंदिर अनुष्ठानों की अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बन गई। पट्टचित्रों के निर्माण अत्यंत सजावटी, कठिन, एवं प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होते है, जिनमें सूती वस्त्र, खनिज रंगों तथा हस्तनिर्मित तुलिकाओं का प्रयोग किया जाता है। समकालीन समय में आधुनिकीकरण, डिजिटलीकरण तथा बाजारवाद ने इस कला को नए अवसर प्रदान किए हैं किन्तु हस्तनिर्मित परंपरा, पट्टचित्रों की गुणवत्ता और कलाकारों की आजीविका को प्रभावित भी किया है। प्रस्तुत शोध पत्र पट्टचित्रों के वर्तमान स्वरूप, सतत विकास, संरक्षण एवं इनमें नवाचार को परिलक्षित करता है। वैश्वीकरण के प्रभाव और डिजिटल मीडिया तकनीक के प्रयोग से यह कला अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शित की जा रही है जिससे इसकी लोकप्रियता अंतरराष्ट्रीय स्तर तक हो गई है। वैश्विक सांस्कृतिक पहचान मिलने से आज विदेशी पर्यटक इस कला की ओर आकर्षित हो रहे है जिससे पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा मिल रहा है। इसके पृथक यह अध्ययन पट्टचित्रों के विषय-वस्तु में परिवर्तन, पारंपरिक पट्ट चित्रकारों की घटती सहभागिता, मशीन निर्मित उत्पादों के बीच संघर्ष की चुनौतियों को भी रेखांकित करता हैं। इस शोध पत्र का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यह कला केवल सौंदर्य बोध व चित्रांकन का माध्यम ही नहीं अपितु समाज के बदलते स्वरूप, आधुनिक दृष्टिकोण, और सृजनात्मक स्वतंत्रता को भी अभिव्यक्त करती है।

मुख्य शब्द : रथयात्रा, अनुष्ठान, सांस्कृतिक पहचान, जगन्नाथ संप्रदाय, पांडुलिपि

Page No-256-262

bottom of page