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Special Edition- 2

VOL-1​

​

 Abhinavdhara – IJIIS​

Explore the Special Edition-2 of Abhinavdhara (IJIIS) featuring peer-reviewed research articles on Indic Studies, Sanskrit, Indian Philosophy, and Culture.

 

SRIJANSHODH 2026

International conference on Indian Knowledge Systems, Art, Design, Wellness, and Cultural Heritage                 

 

Organised by ​

 Shabdārambh:

Global Academy of Art,Culture, Languages & Wellness Date: 29th & 30th August 2026 (virtual mode) 

भारतीय सांस्कृतिक विरासत एवं कला के अंकिय संरक्षण में प्रयोगधर्मी प्रवृत्तियों का योगदान

कुo नगमा सलमानी
शोध छात्रा (चित्रकला विभाग), रघुनाथ गर्ल्स पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, मेरठ
डॉ. नाज़िमा इरफान
असिस्टेंट प्रोफेसर एवं शोध निर्देशिका, (चित्रकला विभाग)
रघुनाथ गर्ल्स पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, मेरठ

शोध-सार:-
इक्कीसवीं सदी के इस दौर में प्रौद्योगिकी के उत्कर्ष युग में भारत की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है| सांसारिक कलाकृतियां समय के प्रभाव, मानवीय उपेक्षा एवं पर्यावरणीय कारकों के कारण सतत ह्रासोन्मुख है| प्रस्तुत शोध-पत्र के अंतर्गत इसी संकटमय पृष्ठभूमि के अंतर्गत अंकीय संरक्षण की विधि और उसमें समकालीन प्रयोगधर्मी प्रवृत्तियों के योगदान से संरक्षित कला पर व्यापक मूल्यांकन करता है, साथ ही भारत की प्राचीन कला निधि जो समय के साथ नष्ट होने लगी है उसे हम किस प्रकार से अंकीय या 'डिजिटल टूल्स' के माध्यम से पुनः रचित करके सुरक्षित रख सकते हैं पर विचार किया जाएगा। वर्तमान समय की कला ने विभिन्न आधुनिक माध्यमों को अपना कर कला के प्राचीन रूप को पूरी तरह बदल दिया है, जहां कला भित्तियों, कैनवासों, कागजों एवं पोथियों पर देखने के लिए मिलती थी, वहीं अब कला पूरी तरह कृत्रिम होकर कंप्यूटर, आभासी वास्तविकता के रूप में अभिव्यक्त की जा रही है। इस शोध के अंतर्गत विभिन्न विधाओं, दार्शनिक सौंदर्य शास्त्री एवं तकनीकी पक्षों के साथ आने वाले नए मार्गों की चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है।

मुख्य शब्द- अंकिय संरक्षण, प्राचीन कला, न्यू मीडिया, सांस्कृतिक विरासत, समकालीन कला एवं कलाकार, कला का लोकतंत्रीकरण एवं प्रयोगधर्मी प्रवृत्तियां|

Page No- 178-185

शोध-सार:-
इक्कीसवीं सदी के इस दौर में प्रौद्योगिकी के उत्कर्ष युग में भारत की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है| सांसारिक कलाकृतियां समय के प्रभाव, मानवीय उपेक्षा एवं पर्यावरणीय कारकों के कारण सतत ह्रासोन्मुख है| प्रस्तुत शोध-पत्र के अंतर्गत इसी संकटमय पृष्ठभूमि के अंतर्गत अंकीय संरक्षण की विधि और उसमें समकालीन प्रयोगधर्मी प्रवृत्तियों के योगदान से संरक्षित कला पर व्यापक मूल्यांकन करता है, साथ ही भारत की प्राचीन कला निधि जो समय के साथ नष्ट होने लगी है उसे हम किस प्रकार से अंकीय या 'डिजिटल टूल्स' के माध्यम से पुनः रचित करके सुरक्षित रख सकते हैं पर विचार किया जाएगा। वर्तमान समय की कला ने विभिन्न आधुनिक माध्यमों को अपना कर कला के प्राचीन रूप को पूरी तरह बदल दिया है, जहां कला भित्तियों, कैनवासों, कागजों एवं पोथियों पर देखने के लिए मिलती थी, वहीं अब कला पूरी तरह कृत्रिम होकर कंप्यूटर, आभासी वास्तविकता के रूप में अभिव्यक्त की जा रही है। इस शोध के अंतर्गत विभिन्न विधाओं, दार्शनिक सौंदर्य शास्त्री एवं तकनीकी पक्षों के साथ आने वाले नए मार्गों की चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है।

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