top of page

महाभारत में वर्णित पृथ्वी-कम्पन : प्राचीन भारतीय दृष्टि और आधुनिक विज्ञान के आलोक में

मयङ्क मणि त्रिपाठी

शोधच्छात्र, संस्कृत पालि, प्राकृत एवं प्राच्य भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयागराज

Abhinavdhara: International Journal of Innovation in Indic Studies

Volume-4

Issue: 1

Publication year-2026

सारांश –
महाभारत भारतीय ज्ञान- परम्परा का एक विश्वकोषीय ग्रन्थ माना जाता है, जिसमें मानव जीवन के विविध आयामों के साथ-साथ प्राकृतिक घटनाओं का भी अत्यन्त सूक्ष्म एवं यथार्थ चित्रण उपलब्ध होता है । भूकम्प ( पृथ्वी का कम्प ) से सम्बन्धित वर्णन महाभारत के विभिन्न पर्वों में परिलक्षित होता है । इस ग्रन्थ में पृथिवी का कम्पित होना, पर्वतों का विचलन होना, दिशाओं का विक्षुब्ध होना, उल्कापात, मेघगर्जन तथा अन्य प्राकृतिक घटनाओं का समवेत उल्लेख प्राप्त होता है । विभिन्न स्थानों पर इन्हें अपशकुन अथवा दैवी सङ्केत माना गया है, किन्तु आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से इनका पुनर्पाठ प्राचीन भारतीय पर्यावरणीय चेतना, आपदा को उद्घाटित कर सकता है । इसी सन्दर्भ में महाभारत में वर्णित पृथ्वी के कम्पन सम्बन्धी प्रसङ्गो का क्रमबद्ध वर्णन करना नितान्त आवश्यक है । प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य महाभारत में वर्णित पृथ्वी के कम्पन से सम्बन्धित प्रसङ्गो का वर्णन विविध आधारों पर विश्लेषित किया जाएगा, जिसमें उसकी तुलना आधुनिक भूकम्प- विज्ञान, भारतीय भूगर्भीय अवधारणाओं तथा प्राचीन भारतीय ज्योतिष ग्रन्थों जैसे-बृहत्संहिता एवं अद्भुतसागर में प्रतिपादित भूकम्प सम्बन्धी सिद्धान्तों से तो किया ही जाएगा, साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि महाभारत के प्राकृतिक वर्णनों का वैज्ञानिक आधार किस सीमा तक परस्पर सम्बद्ध है । इस प्रकार महाभारत में वर्णित कम्पनों का भारतीय ज्ञान- परम्परा और आधुनिक भूकम्प- विज्ञान के मध्य अन्तः विषयी संवाद स्थापित करते हुए महाभारत में निहित भू-वैज्ञानिक सङ्केतों के पुनर्मूल्याङ्कन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करेगा ।

Keywords- महाभारत, पृथ्वी-कम्पन, भूकम्प, भू-विज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण

Page Number-48–61

10.67754/ijiis.vol4.issue.01.005

How to cite ?- Tripathi, M. M. (2026). Mahābhārate Varṇita Pṛthvī-Kampana: Prācīna Bhāratīya Dṛṣṭi Aura Ādhunika Vijñāna ke Āloka Meṃ. Abhinavdhara: International Journal of Innovation in Indic Studies, 4(1), 48–61. https://doi.org/10.67754/ijiis.vol4.issue.01.005

bottom of page