top of page

आधुनिक काव्यशास्त्रीय विमर्श में अलंकार सिद्धान्त का पुनर्मूल्यांकन एवं पुनर्प्रतिष्ठा

1. डॉ, मृगांक मलासी,
2. डॉ, शिवानन्द नौटियाल

1. सहायक आचार्य (संस्कृत), 2. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कर्णप्रयाग (चमोली) उत्तराखण्ड

Abhinavdhara: International Journal of Innovation in Indic Studies

Volume-4

Issue: 1

Publication year-2026

शोधसार- भारतीय काव्यशास्त्र की दीर्घ परम्परा में अलंकार सिद्धान्त का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रहा है। काव्य की रमणीयता, चमत्कार एवं प्रभावोत्पादकता के प्रमुख साधन के रूप में अलंकारों की स्वीकृति प्राचीन काल से ही रही है। आचार्य भामह ने अलंकार को काव्य का अनिवार्य तत्त्व मानते हुए उसे काव्य-सौन्दर्य का मूल आधार स्वीकार किया, जबकि आचार्य दण्डी ने अलंकारों को काव्य की शोभा-वृद्धि करने वाला तत्व माना। यद्यपि परवर्ती काल में आनन्दवर्धन के ध्वनि सिद्धान्त तथा अभिनवगुप्त के रस-विमर्श के प्रभाव से अलंकार की स्वतन्त्र सत्ता कुछ सीमित दिखाई देने लगी, तथापि आधुनिक काव्यशास्त्रीय विमर्श में अलंकार को पुनः केवल बाह्य भूषण न मानकर काव्य की अन्तर्निहित रचनात्मक शक्ति के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।
आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रमुख चिन्तक आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी एवं आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी ने भारतीय काव्यशास्त्रीय परम्परा को आधुनिक आलोचनात्मक दृष्टि से देखने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

इनके विचारों में काव्यशास्त्र केवल रूढ़ सिद्धान्तों का संग्रह नहीं, अपितु काव्यानुभूति, भाषा-सौन्दर्य एवं सृजनात्मक अभिव्यक्ति का विज्ञान है।
इस दृष्टि से अलंकार केवल शब्द एवं अर्थ की सज्जा नहीं, अपितु कवि की कल्पना, अनुभूति और अर्थ-निर्माण प्रक्रिया का मूल साधन है। प्रस्तुत शोध-पत्र में अलंकार सिद्धान्त की विकास-यात्रा का विवेचन करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि आधुनिक काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में अलंकार पुनः काव्यात्मा के रूप में प्रतिष्ठित होने की क्षमता रखता है।

Keywords- अलंकार, काव्यात्मा, भारतीय काव्यशास्त्र, भामह, रेवाप्रसाद द्विवेदी, राधावल्लभ त्रिपाठी, आधुनिक आलोचना, काव्य-सौन्दर्य।

Page Number-34-47

10.67754/ijiis.vol4.issue.01.004

How to cite?- Malasi, M., & Nautiyal, S. (2026). Ādhunika Kāvyaśāstrīya Vimārśa Meṃ Alaṅkāra Siddhānta Kā Punar-Mūlyāṅkana Evaṃ Punar-Pratiṣṭhā. Abhinavdhara: International Journal of Innovation in Indic Studies, 4(1), 34-47. https://doi.org/10.67754/ijiis.vol4.issue.01.004

bottom of page