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निष्काम कर्म सिद्धान्त : भारतीय ज्ञान परम्परा (IKS) में दार्शनिक आधार और आधुनिक जीवन में व्यावहारिक अनुप्रयोग
सुमित शुक्ला
शोध छात्र, संस्कृत विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
Publication Type - Journal Article
Publication Year - 2026
Journal Name - Abhinavdhara Journal
Volume/ Issue - Special Issue-Vol -2
Pagination - 160-171
Article Type - Research Paper
सारांश
भारतीय ज्ञान परम्परा में निष्काम कर्म सिद्धान्त मानव जीवन के नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आयामों को संतुलित करने वाला एक केन्द्रीय दार्शनिक सिद्धान्त है। इसका मूल प्रतिपादन श्रीमद्भगवद्गीता में प्राप्त होता है, जहाँ कर्म करते हुए फल की आसक्ति त्यागने की शिक्षा दी गई है — “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”[1]। यह सिद्धान्त केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि जीवन-व्यवहार की एक व्यावहारिक पद्धति भी है। इस शोध का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा में निष्काम कर्म के दार्शनिक आधारों का विश्लेषण करना तथा उसके आधुनिक जीवन में व्यावहारिक अनुप्रयोगों को स्पष्ट करना है। अध्ययन में गीता, उपनिषदों एवं धर्मशास्त्रीय दृष्टियों के आलोक में कर्तव्य, वैराग्य, आत्मसंयम तथा लोकसंग्रह की अवधारणाओं का विवेचन किया गया है, साथ ही आधुनिक संदर्भों — जैसे नेतृत्व, कार्य-संस्कृति, मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, तथा सामाजिक उत्तरदायित्व — में निष्काम कर्म सिद्धान्त की उपयोगिता का परीक्षण किया गया है। शोध से यह स्पष्ट होता है कि निष्काम कर्म तनाव-मुक्त कर्मपद्धति, नैतिक नेतृत्व, और आंतरिक संतुलन के निर्माण में अत्यंत सहायक है। यह व्यक्ति को परिणाम-केंद्रित मानसिक दबाव से मुक्त कर कर्म-केंद्रित उत्कृष्टता की ओर प्रेरित करता है। इस प्रकार, निष्काम कर्म सिद्धान्त प्राचीन भारतीय दार्शनिक चिन्तन और आधुनिक जीवन प्रबंधन के बीच एक सशक्त सेतु के रूप में उभरता है।
संकेत शब्द- निष्काम कर्म, भारतीय ज्ञान परम्परा (IKS), भगवद्गीता, कर्मयोग, लोकसंग्रह, नैतिक नेतृत्व, जीवन प्रबंधन, मानसिक संतुलन

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