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    श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ की भूमिका (वैश्विक एवं समकालीन परिप्रेक्ष्य में)

सतीश चन्द्र कैवर्त

शोधछात्र ,

फिलॉसफी डिपार्टमेंट

डी.एस.वी.वी. गायत्रीकुंज-शांतिकुंज हरिद्वार

डा. कृष्‍‍णा झरे

दर्शनशास्त्र विभाग, देव संस्कृति विश्वविद्यालय शांतिकुंज हरिद्वार, उत्तराखंड

Publication Type  -   Journal Article

Publication Year    -   2026

Journal Name   -   Abhinavdhara Journal

Volume/ Issue  -    Special Issue-Vol -2

Pagination -            192-202

Article Type   -       Research Paper

सारांश –

समस्त भारत वर्ष की सोये हुए प्रसुप्त अंतरात्मा को पुनर्जागरण हेतु ज्ञान एवं विज्ञान की प्रतिष्ठापना करना अतिआवश्यक है। ज्ञान एवं विज्ञान के बल पर ही कोई व्यक्ति या राष्ट्र उन्नति कर सकता है। इन दोनों में एक की कमी हो तो अधःपतन आरंभ हो जाता है। ज्ञान और विज्ञान का सर्वश्रेष्ठ एवं उत्तम कार्य यज्ञ में ही सन्निहित है। आत्मसाक्षात्कार,स्वर्ग का सुख साधन, बंधन एवं मुक्ति, मन की शुद्धि, पाप संताप एवं प्रायश्चित कर्म, आत्मबल, मनोबल, शरीरबल, इच्छाशक्ति, समग्र स्वास्थ्यवर्धक, आत्मोन्नत्ति, ऋ़िद्ध-सिद्धि के केन्द्र भी यज्ञ ही थे। यज्ञीय जीवन जीकर किए गये कर्मों वाला जीवन ही श्रेष्ठतम जीवन है।3 आत्मस्वरूप यज्ञ - इसके अनुसार गीताकार का आशय है- परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होकर ब्रह्मरूप अग्नि में यजन करना। अर्थात् ’’ब्रह्माग्नि “ में जीवात्मा हविस्य के रूप में आहुति देना ही ज्ञानयज्ञ कहलाता है।4

आध्यात्मिक यज्ञीय ज्ञान का अर्थ है विद्या, बुद्धिमत्ता, विवेक, दूरदर्शिता, सद्भावना, उदारता और न्यायप्रियता जैसे गुणों का समन्वित रूप। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार आध्यात्मिक यज्ञ के अन्तर्गत देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, आत्मयज्ञ, तपयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ज्ञानयज्ञ, प्राणयज्ञ, संयमयज्ञ, आहारयज्ञ आदि की चर्चा करते हुये यह बताया गया है कि आत्मकल्याण व प्रभुप्राप्ति के मार्ग पर चलते हुए जो भी सत्साधन कार्य में लाए जाते हैं, वे सब यज्ञरूपी ही है।5(गीता 4/25-30) 

आचार्य श्री के अनुसार - यह परमार्थप्रियता , परस्पर सहयोग, सद्भावना की वृत्ति, संयम, त्याग, उदारता, धर्मप्रियता, आस्तिकता एवं ईश्वर उपासना की भावना ही यज्ञ का वास्तविक रहस्य है।6

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार - सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थों को अपना और अपने लिए न मानकर केवल भगवान के लिए ही मानना “भगवद्दर्पणरूप यज्ञ” है। परमात्मा की सत्ता में अपनी सत्तामिला देना अर्थात् ‘मैं’ - पन को मिटा देना “अभिन्नता रूप यज्ञ” है।7

 

कूटशब्द – ज्ञानयज्ञ, यज्ञीय जीवन, यज्ञ, कर्म, मुक्ति, आत्मशुद्धि, भगवद्गीता, श्रीमद्भगवद्गीता।

Chief Editor Contact

Dr Supriya Sanju

Adjunct Professor, Department of Indian Knowledge & Languages

Gurugram University Gurugram

Phone: 9818244235 Email id: supriyasanju@gmail.

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