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श्रीमद्भगवद्गीता का 'आनंदवाद' और भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS): समकालीन हिंदी साहित्य में परिकल्पित एक स्वस्थ एवं संतुलित समाज

डॉ. रुचि पालीवाल

असिस्टेंट प्रोफेसर

गुरु नानक गर्ल्स पी. जी. कॉलेज, उदयपुर

Publication Type  -   Journal Article

Publication Year    -   2026

Journal Name   -   Abhinavdhara Journal

Volume/ Issue  -    Special Issue-Vol -2

Pagination -            172-182

Article Type   -       Research Paper

सारांश

"अक्षर-अक्षर में अमर, जो चेतना का सार है, यह बोध की वह रश्मि है, जो तिमिर के पार है।

जहाँ कर्म का सौंदर्य ही, आनंद का आधार बने, साहित्य के उस क्षितिज में, गीता ही बस विस्तार है।"

​भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) का इतिहास अत्यंत प्राचीन एवं गौरवशाली है, जिसका मुख्य ध्येय सदैव से ही मानवीय चेतना का सर्वांगीण विकास रहा है। इस परंपरा के केंद्र में श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसे अक्षय ऊर्जा पुंज के रूप में विद्यमान है, जो जीवन के जटिलतम द्वंद्वों के मध्य 'आनंद' की खोज का मार्ग प्रशस्त करती है। वर्तमान २१वीं सदी के संक्रमण काल में, जहाँ एक ओर तकनीकी एवं भौतिक उन्नति अपने शिखर पर है, वहीं दूसरी ओर मानवीय अंतर्मन तनाव, अवसाद और दिशाहीनता के गहरे कुहासे में घिरा हुआ है। ऐसी स्थिति में गीता का 'आनंदवाद' केवल एक दार्शनिक विचार न रहकर एक व्यावहारिक औषधि के रूप में उभरता है। प्रस्तुत शोध-पत्र का मुख्य स्वर इसी आनंद की खोज और उसकी स्थापना पर केंद्रित है।

​गीता का 'आनंदवाद' किसी क्षणिक इंद्रिय सुख का नाम नहीं है, अपितु यह 'स्थितप्रज्ञता' और 'निष्काम कर्म' के समन्वय से उत्पन्न वह मानसिक अवस्था है, जिसे प्राप्त करने के पश्चात बाहरी संसार की सफलता या विफलता मनुष्य के आंतरिक संतुलन को विचलित नहीं कर पाती। जब भगवान कृष्ण 'योग: कर्मसु कौशलम्' (गीता, २.५०) का सूत्र देते हैं, तो वे वास्तव में कर्म की उस पराकाष्ठा की ओर संकेत करते हैं जहाँ कर्म स्वयं में एक उत्सव बन जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन साहित्य का मिलन होता है। साहित्य सदैव से ही दर्शन का सुगम स्वरूप रहा है। हिंदी साहित्य के इतिहास को देखें तो जयशंकर प्रसाद जैसे मनीषी साहित्यकारों ने 'कामायनी' के माध्यम से इसी आनंदवाद को एक आधुनिक सामाजिक आधार प्रदान किया। प्रसाद जी का यह मानना था कि जब मनुष्य अपनी व्यक्तिगत संकीर्णताओं से ऊपर उठकर समरसता को प्राप्त करता है, तभी वह वास्तविक आनंद का अधिकारी बनता है। उनका यह काव्यमयी विचार वस्तुतः गीता के ही 'समत्व' भाव का एक साहित्यिक विस्तार है।

​आज की नवयुवा पीढ़ी के संदर्भ में इस शोध की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। आधुनिक युवा, जो निरंतर प्रतिस्पर्धा और उपलब्धियों के पीछे भाग रहा है, वह अक्सर प्रक्रिया (Process) को भूलकर केवल परिणाम (Result) के दबाव में जीने का अभ्यस्त हो गया है। गीता का 'अनासक्ति योग' उन्हें सिखाता है कि कार्य की कुशलता उसके परिणाम की चिंता में नहीं, बल्कि वर्तमान क्षण में पूर्ण एकाग्रता के साथ जीने में है। यह शोध-पत्र यह स्थापित करता है कि IKS का यह व्यावहारिक पक्ष युवाओं को एक मानसिक सुरक्षा चक्र (Mental Safety Shield) प्रदान करता है, जो उन्हें किसी भी प्रकार के 'विषाद' से निकालकर 'प्रसाद' (आंतरिक शांति) की ओर ले जाता है। जब युवा वर्ग इस संतुलित दृष्टि को आत्मसात करेगा, तभी एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना मूर्त रूप ले सकेगी।

​शोध का व्यापक आयाम यह भी स्पष्ट करता है कि स्वस्थ समाज का आधार केवल शारीरिक आरोग्यता नहीं, बल्कि वैचारिक एवं मानसिक शुद्धि है। समकालीन हिंदी साहित्य ने गीता के इन गूढ़ सूत्रों को कविताओं, निबंधों और आख्यानों के माध्यम से जन-सामान्य के जीवन से जोड़ा है। साहित्यकारों ने यह सिद्ध किया है कि आनंद कोई बाहरी वस्तु नहीं जिसे अर्जित किया जाए, बल्कि यह हमारे भीतर का वह स्वभाव है जिसे केवल 'अज्ञान' के आवरण ने ढका हुआ है। भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य इसी आवरण को हटाना है। निष्कर्षतः, यह शोध-पत्र यह प्रतिपादित करता है कि श्रीमद्भगवद्गीता का 'आनंदवाद' ही वह सेतु है जो प्राचीन ज्ञान को आधुनिक आवश्यकताओं से जोड़ता है। यह मात्र एक शोध का विषय नहीं, बल्कि एक 'जीवन-दृष्टि' है। यदि हम अपने शैक्षिक और सामाजिक ढांचे में IKS के इन मूल्यों को पुनः स्थापित कर सकें, तो न केवल भारत बल्कि वैश्विक समाज एक स्थायी शांति और अखंड आनंद की अनुभूति कर सकेगा। साहित्य की सृजनात्मकता और गीता की तार्किक गहराई का यह संगम ही मानवता के भविष्य का वास्तविक मार्गदर्शक है, जो एक ऐसे संतुलित समाज की नींव रखेगा जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म में सौंदर्य और जीवन में आनंद का अनुभव कर सकेगा।

बीज शब्द: भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS), श्रीमद्भगवद्गीता, आनंदवाद, समकालीन हिंदी साहित्य, मानसिक स्वास्थ्य, निष्काम कर्म, युवा पीढ़ी, डिजिटल भटकाव, संतुलित समाज।

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