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व्यावहारिक परिदृश्य में श्रीमद्भगवद्गीता की उपादेयता
डॉ. मृगांक मलासी
सहायक आचार्य (संस्कृत)
डॉ. शिवानन्द नौटियाल
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कर्णप्रयाग (चमोली) उत्तराखण्ड
Publication Type - Journal Article
Publication Year - 2026
Journal Name - Abhinavdhara Journal
Volume/ Issue - Special Issue-Vol -2
Pagination - 183-191
Article Type - Research Paper
सारांश
श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय दर्शन का एक कालजयी ग्रंथ है, जो केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग ही नहीं, बल्कि मानव जीवन के व्यावहारिक पक्षों का भी गहन समाधान प्रस्तुत करता है। आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य तनाव, प्रतिस्पर्धा, नैतिक द्वंद्व और मानसिक अस्थिरता से ग्रस्त है, वहाँ गीता के सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध होते हैं।
गीता का कर्मयोग व्यक्ति को निष्काम भाव से कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देता है, जिससे तनाव और परिणाम-चिंता में कमी आती है। समत्वबुद्धि जीवन के उतार-चढ़ाव में मानसिक संतुलन बनाए रखने का मार्ग प्रदान करती है। स्वधर्म का सिद्धांत व्यक्ति को अपनी प्रकृति और क्षमता के अनुरूप कार्य करने की प्रेरणा देता है, जिससे आत्मसंतोष और आत्मविकास संभव होता है।
गीता में प्रतिपादित ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय आधुनिक जीवन की जटिलताओं का समग्र समाधान प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ न केवल व्यक्तिगत जीवन में संतुलन स्थापित करता है, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिकता और नेतृत्व के आदर्शों को भी सुदृढ़ करता है।
अतः यह स्पष्ट है कि श्रीमद्भगवद्गीता का दर्शन आधुनिक जीवन की समस्याओं के समाधान हेतु एक व्यावहारिक, नैतिक और सार्वकालिक मार्गदर्शक के रूप में आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
बीज शब्द: भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS), श्रीमद्भगवद्गीता, समकालीन, मानसिक स्वास्थ्य, व्यावहारिक, मानसिक संकट, कर्त्तव्य-बोध।

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