top of page
PEACOCK AND KRISHNA.jpg

मानवीय संवेदनाओं से जनित कर्तव्याकर्तव्य का अन्तर्द्वद्व एवं श्रीमद्भगवद्गीता

डॉ० विश्वजीत कुमार 'विद्यालंकार'

सहायक प्राध्यापक सह विभागाध्यक्ष

संस्कृत विभाग, आर० डी० & डी० जे० कॉलेज

मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर

Publication Type  -   Journal Article

Publication Year    -   2026

Journal Name   -   Abhinavdhara Journal

Volume/ Issue  -    Special Issue-Vol -2

Pagination -            29-36

Article Type   -       Research Paper

शोध-सार

परमपिता परमेश्वर की नित्य एवं दृढ़तापूर्ण अनुशासन से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गतिशील है। सृष्टि उत्पत्ति से ही इस अलौकिक शक्ति से संसरीत संसार की नानाविध गतिविधियों को मनुष्यों द्वारा ईश्वरीय लीला या नियति की संज्ञा दी जाती है। मनुष्य जन्म से पूर्व गर्भावस्था में ही संवेदनाओं से युक्त हो जाता है, जिसकी अनुभूति से आनन्दित होने का सौभाग्य उसकी गर्भिणी माँ को प्रायः पाँचवें माह से प्राप्त होने लगता है। जन्म से ही शिशु सांसारिक जीवन की प्रायः सभी संवेदनशीलताओं यथा- सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, मोह-माया, भूख-प्यास, काम-क्रोध, लाभ-हानि, प्रेम-घृणा, भय-निर्भीकता आदि को भलीभाँति अनुभूत करता है। जैसे-जैसे उसका विकास होते जाता है, वह लोकानुकूल वातावरण के साथ अपनी संवेदनाओं का सामंजस्य स्थापित करने लगता है। इस स्थिति में जिसे कुशलता प्राप्त हो गई उसे ही लोक में मानसिक रूप से सशक्त कहा जाता है। जो लोकानुकूल कर्तव्यों के अनुरूप अपनी संवेदनाओं को स्थापित करने में सशंकित हो जाता है, विवेकपूर्वक निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रहता अथवा हमेशा कर्तव्याकर्तव्य के द्वन्द्व के भँवर में उलझ जाता है। ऐसा प्रत्येक मानव चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, शिशु हो या किशोर, युवा हो या वृद्ध; ये सभी के सभी आज के समय में अपने जीवनरूपी कुरुक्षेत्र के मोहग्रस्त अर्जुन हैं। ऐसे मनुष्यों के संवेदना जनित कर्तव्याकर्तव्य के अंतर्द्वद्व के निदान के नानाविध मार्ग भारतीय संस्कृति में अथवा अन्य संस्कृतियों के ज्ञानकोश में विद्यमान हैं, किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता इसके लिए ब्रह्मास्त्र सदृश है। इसमें योगीराज श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को प्रदत्त उपदेश समस्त संसार के मनुष्यों को कर्म के वास्तविक स्वरूप की तत्त्विक विवेचना प्रस्तुत करता है। गीता के तृतीय अध्याय के परिपेक्ष्य में मानवीय संवेदनाओं की समीक्षा करते हुए जीवन के विविध परिस्थितियों में कर्म करने के विवेकविवेक का निर्णय करने का प्रयास किया जाएगा। जिसमें प्रमुखता से कर्मयोग, कर्म सिद्धान्त, स्वधर्म,  इन्द्रिय निग्रह, पारिवारिक-सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर समीक्षा की जाएगी।

मुख्य शब्द- संवेदना, कर्तव्याकर्तव्य, अन्तर्द्वन्द्व, कर्मयोग, विरक्त, भक्ति, समत्व, नित्यता, अमरता, शाश्वत, मोह

bottom of page