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भारतीय ज्ञान-परंपरा के संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता के आर्थिक मूल्यों की प्रासंगिकता

डॉ. कुलदीप कुमार सेहगल

एसोसिएट प्रोफ़ेसर

माता सुन्दरी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय)

Publication Type  -   Journal Article

Publication Year    -   2026

Journal Name   -   Abhinavdhara Journal

Volume/ Issue  -    Special Issue-Vol -2

Pagination -            125-142

Article Type   -       Research Paper

सारांश

अभिनव शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार और विस्तार पर विशेष बल दिया जा रहा है। श्रीमद्भगवद्गीता भारतीय ज्ञानराशि का अमूल्य रत्न है, जिसके आलोक ने न केवल भारतवर्ष को अपितु समग्र विश्व को आध्यात्मिक, सामाजिक, नैतिक, दार्शनिक एवं उत्कृष्ट अर्थशास्त्रीय मूल्य भी प्रदान किए हैं।

वस्तुतः भारतीय ज्ञान परंपरा, जो वेद प्रतिपादित आदर्शों और मूल्यों से अनुप्राणित है। उन वेदों की व्याख्या करने वाले महाभारत इत्यादि ग्रंथों में जीवन की समग्रता को केवल धर्म और मोक्ष तक ही सीमित न रखते हुए चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन सभी की उपलब्धि को आदर्श के रूप में स्थापित किया गया है।

“धर्मे अर्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभः।

यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्॥”¹

ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता, जो कि महाभारत के भीष्म पर्व का ही एक अंश है। उसमें भला किस प्रकार जीवन की समग्रता का प्रतीक समझे जाने वाले अर्थ और काम नामक पुरुषार्थों की पूरी तरह उपेक्षा हो सकती है। वास्तव में श्रीमद्भगवद्गीता अर्थ और काम नामक पुरुषार्थों के दमन में जीवन की समग्रता को नहीं देखती, अपितु इनके संतुलन और सुनियोजन में ही भगवद्गीता का निहितार्थ उपलब्ध होता है।

आधुनिक प्रसंगों में भी जब भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार नई पीढ़ी का सर्वांगीण विकास करना ही शिक्षा और राष्ट्रनीति का लक्ष्य निर्धारित हो चुका है, तब ऐसी स्थिति में भगवद्गीता जैसे आध्यात्मिक ग्रंथ की प्रासंगिकता को और अधिक समृद्ध करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक कर्तव्य है कि गीता की व्याख्या करते समय केवल धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों की ही नहीं, बल्कि उसमें प्रतिपादित जीवन के आर्थिक पक्ष और संतुलित भौतिक विकास पर आधारित संदेशों को भी अत्यंत सावधानी के साथ प्रचारित किया जाए।

इसी उपर्युक्त महत्त्वपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमारे द्वारा गीता पर आधारित अर्थशास्त्रीय मूल्यों को आधार बनाकर लिखे गए यत् किंचित शोध साहित्य का अवलोकन और विषयान्वेषण उपलब्ध साधनों के आधार पर किया गया है। शोध गंगा (यूजीसी) तथा (गूगल स्कॉलर) इत्यादि आभासी पटलों पर रिसर्च गेट जैसे अंतर्जालीय स्रोतों के साथ-साथ विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुस्तकालयों तथा प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं से संकलित विषय सामग्री के आधार पर

यह ज्ञात हुआ है कि गीता में प्रबंधन, व्यावसायिक नैतिकता और नेतृत्व आदि विषयों पर उपलब्ध शोध सामग्री यद्यपि आधुनिक संदर्भ में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती हैं तथापि इनके अतिरिक्त अर्थशास्त्र के अनेक ऐसे पक्ष हैं जिनका मूल्यांकन आवश्यक समझा जा रहा है। जैसे श्रम विभाजन, कौशल संवर्धन, स्थायी विकास,पर्यावरण संरक्षण, भ्रष्टाचार और अपराधों से मुक्त आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, तनावरहित और मानसिक स्वास्थ्य से युक्त व्यावसायिक परिस्थितियों की स्थापना इत्यादि।

भारतीय दार्शनिक परंपरा के अनुसार अर्थ और काम पुरुषार्थ केवल सांसारिक या भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं हैं, अपितु वे आध्यात्मिक साधना के पथ पर अग्रसर साधक मनुष्यों के लिए भी अनिवार्य माने गए हैं। भौतिक संसाधनों का संतुलित, मर्यादित एवं धर्मसम्मत उपयोग ही व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाता है — यह गीता का मूल संदेश है।

इस अध्ययन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता द्वारा प्रतिपादित आर्थिक मूल्यों की सम्यक समीक्षा करना है, साथ ही यह स्पष्ट करना है कि अर्थ और काम नामक पुरुषार्थों तथा भौतिक संसाधनों की आवश्यकता साधक मनुष्यों के लिए भी क्यों और कैसे अपरिहार्य है। ऐसा विश्वास है कि यह विवेचन आधुनिक प्रबंधन दृष्टिकोण और पारंपरिक आध्यात्मिक चेतना के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायक सिद्ध होगा।

मुख्य शब्द-भारतीय ज्ञान परंपरा, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्म, आत्मा, मोक्ष, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, अद्वैत दर्शन, निष्काम कर्म, ब्रह्मात्मैक्य

Chief Editor Contact

Dr Supriya Sanju

Adjunct Professor, Department of Indian Knowledge & Languages

Gurugram University Gurugram

Phone: 9818244235 Email id: supriyasanju@gmail.

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