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भगवद् गीता में आदर्श नेतृत्व की अवधारणा और उसकी समकालीन प्रासंगिकता

सतीश कुमार भारद्वाज

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग

महर्षि दयानंद राजकीय कन्या महाविद्यालय - दादूपुर रोड़ान, जिला - करनाल

(कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र से संबद्ध)

Publication Type  -   Journal Article

Publication Year    -   2026

Journal Name   -   Abhinavdhara Journal

Volume/ Issue  -    Special Issue-Vol -2

Pagination -            1-16

Article Type   -       Research Paper

शोध-सार

प्रस्तुत शोधपत्र में भगवद् गीता का केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ के रूप में ही नहीं बल्कि उसका नेतृत्व और व्यावहारिक जीवन-दर्शन के व्यापक संदर्भ में विश्लेषण किया गया है। इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि गीता में वर्णित नेतृत्व की अवधारणा केवल तत्कालीन समाज के लिए ही उपयोगी नहीं थी, बल्कि आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

महाभारत की युद्धभूमि में अर्जुन का विषाद आधुनिक मनुष्य और नेतृत्वकर्ता की मानसिक दुविधा और नैतिक संकट का प्रतीक है। वहीं श्रीकृष्ण का संवाद-आधारित मार्गदर्शन एक ऐसे आदर्श नेतृत्व मॉडल को प्रस्तुत करता है, जो आदेशात्मक नहीं है, बल्कि विवेक और आत्मबोध पर आधारित है। गीता का नेतृत्व-दर्शन कर्तव्यनिष्ठा, निष्काम कर्म, विवेकपूर्ण निर्णय-निर्माण, नैतिक मूल्यों, सेवाभाव और लोककल्याण पर आधारित है।

गीता नेतृत्व को केवल सत्ता या अधिकार से नहीं जोड़ती, बल्कि उसे एक नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में स्थापित करती है। गीता का योग-दर्शन आधुनिक नेतृत्व को मानसिक संतुलन, तनाव-प्रबंधन और आत्मसंयम की प्रभावी दृष्टि प्रदान करता है, जो आज के प्रशासनिक, राजनीतिक और कॉर्पोरेट नेतृत्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।

समकालीन संदर्भ में यह स्पष्ट है कि नैतिक पतन, निर्णय-अस्थिरता, तनाव और मानव-केंद्रित दृष्टि का अभाव जैसे वर्तमान नेतृत्व-संकट को गीता के मूल्य-आधारित दर्शन द्वारा संतुलित किया जा सकता है। गीता का मानवतावादी दृष्टिकोण वैश्विक शांति, सहअस्तित्व और सतत विकास की अवधारणाओं को भी सुदृढ़ करता है। निष्कर्षतः गीता में वर्णित आदर्श नेतृत्व की अवधारणा आज भी समाज, राष्ट्र और विश्व के लिए एक सशक्त और प्रासंगिक मार्गदर्शन है।

कुंजी-शब्द - भगवद् गीता, आदर्श नेतृत्व, निष्काम कर्म, नैतिक नेतृत्व, लोककल्याण, योग-दर्शन, समकालीन प्रासंगिकता

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