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भगवद्गीता में भारतीय मनोविज्ञान: मन, चित्त और चेतना का विवेचनात्मक अध्ययन
सोनू रानी
योग प्रशिक्षक, मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान, नई दिल्ली।
दलीप कुमार
योग प्रशिक्षक, मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान, नई दिल्ली।
राहुल सिंह चौहान
योग प्रशिक्षक, मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान, नई दिल्ली।
Publication Type - Journal Article
Publication Year - 2026
Journal Name - Abhinavdhara Journal
Volume/ Issue - Special Issue-Vol -2
Pagination - 17-28
Article Type - Research Paper
शोध-सार
भारतीय मनोविज्ञान मानव मन को केवल व्यवहार, भावना अथवा संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं मानता, बल्कि उसे चेतना-आधारित समग्र दृष्टिकोण से समझता है। इस परंपरा में मनुष्य को शरीर, मन, चित्त और चेतना की एक अविभाज्य इकाई के रूप में देखा गया है, जिसका अंतिम लक्ष्य आत्मबोध और मानसिक संतुलन है। भगवद्गीता भारतीय दर्शन का एक ऐसा अद्वितीय ग्रंथ है, जो अर्जुन के मानसिक विषाद और द्वंद्व के माध्यम से मानव मन की जटिलताओं का सूक्ष्म एवं व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को प्रोत्साहित करते हुए जिन सम्बोधन के शब्दों का प्रयोग किया गया है(Manglik, 2024) वे आधुनिक मनोविज्ञान के मनोवैज्ञानिक परामर्श (Psychological Counselling) से सीधे संबंधित हैं जैसे- हे पुरुषश्रेष्ठ, हे महाबाहो, हे निष्पाप, हे कुरुश्रेष्ठ, ही परंतप, हे जितेंद्रिय, हे भरतश्रेष्ठ, हे धनंजय, हे नरश्रेष्ठ, हे तपस्वी आदि। इस शोध-पत्र का उद्देश्य भगवद्गीता में निहित भारतीय मनोविज्ञान की प्रमुख अवधारणाओं-मन, चित्त और चेतना-का गहन अध्ययन करना है(Patel, 2016)।
भगवद्गीता में मन को विचार, और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का केंद्र बताया गया है। मन की चंचलता और अस्थिरता को स्वीकार करते हुए श्रीकृष्ण उसे नियंत्रित करने के लिए अभ्यास और वैराग्य जैसे मनोवैज्ञानिक उपाय प्रस्तुत करते हैं(SRIVASTAVA & SHARMA, 2025a)। चित्त भारतीय मनोविज्ञान में अवचेतन स्तर का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ कर्मों और अनुभवों से उत्पन्न संस्कार संचित रहते हैं। ये संस्कार व्यक्ति के स्वभाव, आदतों और मानसिक प्रवृत्तियों को आकार देते हैं। भगवद्गीता निष्काम कर्म, भक्ति और योग के माध्यम से चित्त-शुद्धि पर विशेष बल देती है, जिससे मानसिक स्थिरता और विवेक शक्ति का विकास होता है।(Pestonjee & Pandey, 2017)
चेतना भगवद्गीता में आत्मतत्त्व के रूप में वर्णित है, जो मन और चित्त से परे नित्य, अजन्मा और अविनाशी है। चेतना का बोध व्यक्ति को भय, शोक और मोह से मुक्त करता है तथा साक्षी-भाव की अनुभूति कराता है। भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य का सर्वोच्च स्तर वही है, जहाँ व्यक्ति स्व में स्थित होकर जीवन की परिस्थितियों का सामना करता है(Selye, 2017)। इस प्रकार भगवद्गीता मन, चित्त और चेतना के समन्वय द्वारा एक समग्र मनोवैज्ञानिक ढांचा प्रस्तुत करती है।
आज के समय में, जब तनाव, अवसाद और मानसिक असंतुलन की समस्याएँ तीव्र हो रही हैं, भगवद्गीता में निहित भारतीय मनोविज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य के साथ, मानव के समग्र विकास हेतु अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध होता है। यह अध्ययन आधुनिक मनोविज्ञान को चेतना-आधारित एक समग्र और मानवीय दृष्टि प्रदान करने में भी सहायक हो सकता हैं।
मुख्य शब्द- भगवद्गीता, भारतीय मनोविज्ञान, मन–चित्त–चेतना, आत्मबोध, मानसिक संतुलन, योग-दर्शन

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