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भगवद्गीता में कर्तव्य एवं आत्मबोध

ओम प्रकाश कुमार

शोध छात्र (संस्कृत विभाग)

दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

Publication Type  -   Journal Article

Publication Year    -   2026

Journal Name   -   Abhinavdhara Journal

Volume/ Issue  -    Special Issue-Vol -2

Pagination -            143-152

Article Type   -       Research Paper

सारांश

प्रस्तुत शोध पत्र में भगवद्गीता में प्रतिपादित ‘कर्तव्य’ (धर्म एवं कर्म बोध) तथा ‘आत्मबोध’ (आत्मज्ञान) अर्थात् आत्मा के स्वरूप की अवधारणाओं का दार्शनिक, शास्त्रीय एवं समालोचनात्मक अध्ययन किया गया है। भगवद्गीता भारतीय दर्शन की प्रस्थानत्रयी का एक प्रमुख ग्रन्थ है, जिसमें कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वित जीवन-दर्शन प्रस्तुत हुआ है। इस पत्र में गीता के मूल संस्कृत पाठ तथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और माधवाचार्य के भाष्यों के आलोक में यह प्रतिपादित किया गया है कि निष्काम कर्म चित्तशुद्धि का साधन है, जबकि आत्मज्ञान मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन है। इस शोध का मुख्य प्रतिपाद्य यह है कि भगवद्गीता में कर्तव्य और आत्मबोध परस्पर विरोधी न होकर, बल्कि परस्पर पूरक सिद्धान्त हैं। मनुष्य को स्वयं का कर्तव्यबोध उसको नैतिक, सामाजिक एवं कर्मशील जीवन हेतु प्रेरित करता है, जबकि आत्मबोध उसे अविद्या, अहंकार और कर्मबन्धन से मुक्त कर ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति कराता है। भगवद्गीता का दार्शनिक सिद्धांत कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के त्रिविध मार्गों के माध्यम से मनुष्य को लौकिक कर्तव्य और पारलौकिक मुक्ति के बीच समन्वय स्थापित करने की शिक्षा देता है।

प्रस्तुत शोध पत्र के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि भगवद्गीता का कर्तव्य-दर्शन और आत्मबोध-दर्शन सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक है तथा आधुनिक युग में भी नैतिकता, शिक्षा, प्रशासन, प्रबंधन एवं मनोविज्ञान के क्षेत्र में अत्यन्त प्रासंगिक है। इस प्रकार भगवद्गीता मानव जीवन के समग्र नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान हेतु एक समन्वित दार्शनिक आधार प्रदान करती है।

मुख्य शब्द: भगवद्गीता, कर्तव्य, धर्म, आत्मबोध, निष्काम कर्म, ज्ञानयोग, भक्तियोग, मोक्ष।

Chief Editor Contact

Dr Supriya Sanju

Adjunct Professor, Department of Indian Knowledge & Languages

Gurugram University Gurugram

Phone: 9818244235 Email id: supriyasanju@gmail.

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