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गीता के कर्मयोग, नैतिक जीवन एवं नेतृत्व का मनुष्य जीवन में आध्यात्मिक प्रभाव
कुमारी शीतला
शोध छात्रा
दर्शनविभाग
केन्द्रीयसंस्कृतविश्वविद्यालयभोपाल परिसर
Publication Type - Journal Article
Publication Year - 2026
Journal Name - Abhinavdhara Journal
Volume/ Issue - Special Issue-Vol -2
Pagination - 96-102
Article Type - Research Paper
सारांश
भारतीय ज्ञान परम्परा के विविध शाखाओं में श्री मद्भागवत गीता का धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से ही नहीं अपितु दार्शनिक ग्रंथ के रुप में भी प्रतिष्ठा प्राप्त है। यह ग्रंथ महाभारत के भीष्मपर्व में संग्रहीत हैं। जिसमें श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य हुए संवाद में मानव जीवन के विविध गूढतम समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया गया है। युद्ध की तनावपूर्ण स्थिति में भी आत्मा, कर्म, धर्म, योग और मुक्ति जैसे दार्शनिक विषयों में व्याख्या करता है। गीता के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यह केवल तत्कालीन सन्दर्भों तक सीमित नहीं है अपितु सार्वभौमिक और सर्वकालिक है। गीता का उपदेश नैतिक, दार्शनिक,आध्यात्मिक,व्यावहारिक रूप से मानव जीवन को दिशा प्रदान करता है। वर्तमान समय में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है , ऐसे में गीता का ज्ञान अत्यंत प्रासंगिक है। गीता भारतीय संस्कृति, आध्यात्म, और जीवन - दर्शन की धरोहर है। गीता में ज्ञान-कर्म -भक्तियोग, कर्तव्यबोध, स्वधर्म पालन, आदि वर्णित है। ज्ञानयोग, भक्तियोग, और कर्मयोग। इनमें से कर्मयोग को सर्वाधिक व्यावहारिक, सहज और जीवनोपयोगी माना गया है। गीता में कर्मयोग का स्वरूप निष्काम कर्म, कर्तव्य बोध, समत्व बुद्धि. और स्वधर्म पालन पर आधारित है। यह योग व्यक्ति को कर्म से भागने की नहीं, बल्कि कर्म में पूर्ण तन्मयता के साथ स्थित होने की प्रेरणा देता है।कर्मयोग की यह अवधारणा केवल क्रिया के बाह्य रूप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के आंतरिक भावों, मनोवृत्तियों और चेतना के स्तर पर परिवर्तन की मांग करती है। इसका मूल उद्देश्य है 'कर्म करते हुए भी आसक्ति और फल की इच्छा से मुक्त रहना।' यह दृष्टिकोण न केवल व्यक्ति को आत्मिक रूप सेपरिपक्क बनाता है, बल्कि उसे सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति सजग भी करता है ।
इस शोध पत्र कर्मयोग, नैतिक जीवन, नेतृत्व से संबंधित दार्शनिक एवं आध्यात्मिक पक्षों का अध्ययन किया गया है। समकालीन समाज की समस्याओं के समाधान करने में उत्तम मार्गदर्शक सिध्द हो सकता है। अतः गीता में निहित कर्मयोग, नैतिक जीवन, नेतृत्व की अवधारणा को समझने के लिए आधुनिक जीवन में उसकी उपयोगिता और प्रासंगिकता को दर्शाने का प्रयत्न है ।
मुख्य शब्द-भगवद्गीता, भारतीय ज्ञान प्रणाली, नैतिक नेतृत्व, कर्मयोग, निष्काम कर्म, संगठनात्मक नैतिकता, दर्शन, मानव उत्कृष्टता

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