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गीता और मानसिक स्वास्थ्य: एक अंतर्विषयक अध्ययन

डॉ. छाया

सहायक प्राध्यापिका (हिंदी विभाग)

निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह मेमोरियल महाविद्यालय, सोहना

Publication Type  -   Journal Article

Publication Year    -   2026

Journal Name   -   Abhinavdhara Journal

Volume/ Issue  -    Special Issue-Vol -2

Pagination -            50-57

Article Type   -       Research Paper

शोध-सार

आधुनिक समाज में तीव्र प्रतिस्पर्धा, भौतिकता और तकनीकी विकास के बीच मानव-मन तनाव, चिंता, अवसाद तथा भावनात्मक अस्थिरता जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। इस संदर्भ में श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होता है। गीता का उपदेश स्वयं एक गहन मानसिक संकट की स्थिति में दिया गया है, जहाँ अर्जुन विषाद, भ्रम और निर्णय-असमर्थता से ग्रस्त दिखाई देता है। यह स्थिति आधुनिक मनोविज्ञान में वर्णित मानसिक विकारों  से समानता रखती है।

गीता केवल एक धार्मिक या दार्शनिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव-मन की जटिलताओं को समझने और उनका समाधान प्रस्तुत करने वाला एक व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक ग्रंथ है। कर्मयोग का सिद्धांत फल-आसक्ति के त्याग के माध्यम से तनाव और चिंता को कम करने का मार्ग दिखाता है, जबकि ‘स्थितप्रज्ञ’ की अवधारणा मानसिक संतुलन, आत्मसंयम और भावनात्मक स्थिरता का आदर्श प्रस्तुत करती है। आत्मज्ञान भय, असुरक्षा और मृत्यु की चिंता से मुक्ति प्रदान करता है तथा भक्ति व्यक्ति को मानसिक संबल और आंतरिक शांति प्रदान करती है।

श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांत आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य, तनाव-प्रबंधन और जीवन-संतुलन के संदर्भ में अत्यंत उपयोगी हैं। गीता को यदि केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में न देखकर एक समग्र मानसिक

स्वास्थ्य-मार्गदर्शक के रूप में समझा जाए, तो यह आज के तनावग्रस्त समाज के लिए सार्थक और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कर सकती है।

मुख्य शब्द : श्रीमद्भगवद्गीता, मानसिक स्वास्थ्य, कर्मयोग, स्थितप्रज्ञ, आत्मज्ञान, तनाव

Chief Editor Contact

Dr Supriya Sanju

Adjunct Professor, Department of Indian Knowledge & Languages

Gurugram University Gurugram

Phone: 9818244235 Email id: supriyasanju@gmail.

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