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कर्मयोग से नैतिक नेतृत्व तक: समकालीन संगठनात्मक जीवन में भगवद्गीता की प्रासंगिकता
अमरजीत कौर
शोध छात्रा,
शारीरिक शिक्षा, खेल और योग विज्ञान विभाग
सिंघानिया विश्वविद्यालय पचेरी बारी, झुंझुनु (राजस्थान), भारत
Publication Type - Journal Article
Publication Year - 2026
Journal Name - Abhinavdhara Journal
Volume/ Issue - Special Issue-Vol -2
Pagination - 79-95
Article Type - Research Paper
सारांश
भगवद्गीता भारतीय दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो मानव जीवन, नैतिकता, नेतृत्व और कर्तव्यबोध के विषय में गहन मार्गदर्शन प्रदान करता है। आधुनिक वैश्विक और प्रतिस्पर्धात्मक संगठनात्मक वातावरण में संस्थानों को अनेक नैतिक चुनौतियों, हितधारकों के बीच हितों के टकराव तथा जटिल प्रबंधन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में भगवद्गीता की शिक्षाएँ नैतिक नेतृत्व, उत्तरदायी निर्णय-निर्माण तथा संतुलित संगठनात्मक व्यवहार के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकती हैं।
भगवद्गीता भारतीय ज्ञान प्रणाली का एक प्रमुख दार्शनिक स्रोत है, जो नैतिक जिम्मेदारी, नेतृत्व की प्रकृति और मानव कर्म के उद्देश्य को समझने के लिए एक सशक्त वैचारिक ढाँचा प्रस्तुत करती है। यद्यपि यह ग्रंथ प्राचीन सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में रचित है, तथापि इसके सिद्धांत आज के संगठनात्मक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जहाँ नैतिक अनिश्चितता, प्रदर्शन का दबाव तथा मनोवैज्ञानिक तनाव सामान्य स्थिति बन चुके हैं।
यह शोध-पत्र भगवद्गीता के प्रमुख सिद्धांतों—धर्म, कर्मयोग, निष्काम कर्म, समभाव तथा यज्ञ—की समकालीन संगठनात्मक जीवन और नैतिक नेतृत्व के संदर्भ में प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है। व्याख्यात्मक तथा विश्लेषणात्मक पद्धति के माध्यम से यह अध्ययन इस बात की पड़ताल करता है कि गीता से प्रेरित सिद्धांत किस प्रकार नैतिक निर्णय-निर्माण, भावनात्मक संतुलन, सामूहिक उत्तरदायित्व तथा सतत संगठनात्मक विकास को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि गीता का कर्मयोग सिद्धांत नेताओं को कर्तव्यनिष्ठा, निस्वार्थता और उत्तरदायित्व की भावना के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। इसी प्रकार समभाव और निष्काम कर्म का सिद्धांत नेतृत्व को मानसिक संतुलन, निष्पक्षता तथा दीर्घकालिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। गीता का यह दृष्टिकोण भौतिक सफलता के साथ-साथ सामाजिक कल्याण, नैतिक उत्तरदायित्व और मानव मूल्यों के संतुलन पर बल देता है।
यह शोध मुख्यतः द्वितीयक स्रोतों—जैसे पुस्तकों, शोध-पत्रों, दार्शनिक ग्रंथों तथा अकादमिक लेखों—पर आधारित है। अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि यदि आधुनिक प्रबंधन और संगठनात्मक नेतृत्व में भगवद्गीता के सिद्धांतों को समुचित रूप से समाहित किया जाए, तो संगठनों में नैतिकता, कर्मचारी कल्याण, उत्तरदायी नेतृत्व तथा सतत विकास को सुदृढ़ किया जा सकता है।
अतः कहा जा सकता है कि भगवद्गीता केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि एक समग्र और मूल्य-आधारित प्रबंधन दर्शन भी है, जो इक्कीसवीं सदी में संगठनों और नेताओं के समक्ष उपस्थित नैतिक, मनोवैज्ञानिक तथा संस्थागत चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।
मुख्य शब्द-भगवद्गीता, भारतीय ज्ञान प्रणाली, नैतिक नेतृत्व, कर्मयोग, निष्काम कर्म, संगठनात्मक नैतिकता, कॉरपोरेट गवर्नेंस, संगठनात्मक संस्कृति, प्रबंधन दर्शन, मानव उत्कृष्टता

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