top of page
PEACOCK AND KRISHNA.jpg

भारतीय ज्ञान परंपरा में वर्चस्व नहीं, धर्मात्मक सर्वश्रेष्ठता: भगवद्गीता के आलोक में एक दार्शनिक पुनर्पाठ

डॉ. विवेक पाठक

सहायक प्रोफ़ेसर

भारतीय ज्ञान परम्परा केंद्र

तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय,मुरादाबाद,उत्तर प्रदेश

Publication Type  -   Journal Article

Publication Year    -   2026

Journal Name   -   Abhinavdhara Journal

Volume/ Issue  -    Special Issue-Vol -2

Pagination -            109-119

Article Type   -       Research Paper

सारांश

यह सामान्यतः स्वीकार कर लिया गया है कि भारतीय ज्ञान परंपरा का अर्थ केवल कुछ वेदों अथवा उपनिषदों के अध्ययन तक सीमित है। किंतु इस प्रकार की संकीर्ण व्याख्या भारतीय ज्ञान की उस अनादि, जीवंत और सतत प्रकृति को अनदेखा कर देती है, जो न केवल अतीत में विद्यमान थी, बल्कि वर्तमान में भी सक्रिय है और भविष्य में भी बनी रहेगी। ज्ञान किसी एक ग्रंथ, काल या समुदाय की बपौती नहीं होता, बल्कि वह सभ्यता, संस्कृति और परंपरा के साथ निरंतर प्रवाहमान रहता है। भारतीय संदर्भ में वेदों और उपनिषदों का महत्व निर्विवाद है, किंतु भारतीय ज्ञान परंपरा का अर्थ केवल मंत्रों का पाठ नहीं, बल्कि वह एक दार्शनिक विमर्श है—ऐसा विमर्श जो राष्ट्र की अस्मिता, सांस्कृतिक चेतना और धर्मात्मक सर्वश्रेष्ठता को अभिव्यक्त करता है। यहाँ ‘सर्वश्रेष्ठता’ का आशय वर्चस्व या प्रभुत्व से नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य और नैतिक उत्तरदायित्व से है।

मुख्य शब्द- गीता, मानवता, भारतीय ज्ञान परंपरा, श्रीकृष्ण, कर्मयोग

Chief Editor Contact

Dr Supriya Sanju

Adjunct Professor, Department of Indian Knowledge & Languages

Gurugram University Gurugram

Phone: 9818244235 Email id: supriyasanju@gmail.

bottom of page